निबंध - भारत में दहेज़ (जहेज़) प्रथा | Dowry System in India
(1) दहेज़ क्या है?
प्रथाओं का अस्तित्व
सम्भवतः तब से ही है जब से मानव सभ्यता विकसित हुई है, सम्पूर्ण संसार में कईं प्रकार की प्रथाएँ
प्रचलित हैं। प्रथाएँ,
जिन्हें मनुष्यों द्वारा समाज के लिए बनाया गया। किन्तु कभी-कभी ये प्रथाएँ मानव
को अपने वश में कर लेती हैं उनकी सोच और समझ पर परम्परा का पर्दा पड़ जाता है और
अगर कोई उस पर्दे को हटा कर सत्य से लोगों को अवगत कराये तो कुछ लोग उस
‘परिवर्तनकारी सोच’ को दबा देते हैं।
ऐसी ही एक प्रथा है
“दहेज़ प्रथा”। विवाह के बाद पुत्रवधु द्वारा अपने साथ लाये गए उपहारों, गृहस्थी के सामानों,
रुपयों और गहनों और
किसी भी प्रकार की चल और अचल संपत्ति को दहेज़ कहते हैं।
(2) दहेज़ का इतिहास
दहेज़-प्रथा का
प्रचालन किया गया आशीर्वाद स्वरुप विवाह पश्चात् पुत्री के नए घर को नवारम्भ देने
हेतु। किन्तु समय के साथ-साथ कुछ लोभी
प्रवृत्ति के लोगो के कारण इस प्रथा का वास्तविक अर्थ ही बदल गया है। अब “दहेज़
प्रथा” विवाह का बहुत आवश्यक अंग बन गयी है। दहेज़ प्रथा केवल भारत में ही नहीं है
बल्कि इस प्रथा का प्रचलन भारत के साथ-साथ यूरोप, अफ्रीका, चीन, ग्रीस और जापान के साथ कईं देशों में रहा है। अलग-अलग देशों
में दहेज़ का प्रकार और उद्देश्य भी लगभग अलग-अलग ही रहा है पर अब इस प्रथा का
प्रचलन बहुत से देशों ने बंद कर दिया है लेकिन भारत में इस प्रथा ने अब भी विकराल
रूप धारण किया हुआ है।
(3) समाज की भूमिका व समाज पर प्रभाव
कईं लोग दहेज़ न लेने का ढोंग करते हैं, पहले तो वर-पक्ष के
लोगों का कहना होता है की “हमें तो केवल आपकी बेटी चाहिए” और फिर बाद के डायलॉग्स
होते हैं “टीके (शादी से पहले की एक प्रकार की रस्म) में कम से कम एक सोने की चैन,
अंगूठी और 51 हज़ार
नकद तो होना ही चाहिए वरना नातेदार-रिश्तेदार में क्या रह जाएगी?” उसके बाद शादी से
पहले “बेटी के साथ उसके पूरे गहने तो हों, और फिर जो मर्ज़ी हो आप दे दो, जात-समाज का ध्यान
रखते हुए।” बहाना जात-समाज में नाक रखने का होता है और मतलब स्वयं का हल होता है।
यदि लड़का डॉक्टर या इंजीनियर है तो दहेज़ की माँग और भी बढ़ जाती है क्योंकि लड़का
बहुत पढ़ा-लिखा है।
हालाँकि दहेज़ प्रथा
का अस्तित्व बनाये रखने में कन्या-पक्ष का भी कुछ कम योगदान नहीं है, वे भी बराबर के
भागीदार हैं। कुछ के लिए ‘दहेज़ देना’ आवश्यक है क्योंकि समाज में शान बढ़ानी है
चूँकि उनके पास धन है, जिस
कारण से इस प्रथा को और बढ़ावा मिलता है और निर्धन परिवारों पर इसका दुष्प्रभाव
पड़ता है, कुछ के
लिए आवश्यक है क्योंकि लड़का अच्छा है कहीं हाथ से न निकल जाये और कुछ लोग बेटी को
बोझ समझते हैं और जैसे-तैसे उस बोझ को उतार कर फैंक देना चाहते हैं इसलिए भी।
किन्तु बेटियाँ किसी भी प्रकार से बेटों से कम नहीं हैं। कन्या-पक्ष एक गलती यह भी
है की वे दहेज़ की माँग का विरोध करने के बजाय उनकी माँग को पूरा कर देते हैं जो की
बहुत ही गलत है।
(4) दहेज़ के विरुद्ध कानून
दहेज़ प्रथा के
उन्मूलन हेतु कईं कानून बनते रहे हैं और
समय के साथ-साथ कानून को और कठोर भी बनाया गया है। किन्तु फिर भी इस
कु-प्रथा से बेटियाँ नहीं बच पाती। कईं दहेज़ प्रताड़नाओं की शिकायत कानून तक नहीं
पहुँचत पाती हैं और बेटियाँ आत्महत्या जैसा पाप कर लेती हैं।
दहेज़ प्रथा से सम्बंधित क़ानून निम्नलिखित हैं –
•
दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के अनुसार दहेज लेने, देने या इसके
लेन-देन में सहयोग करने पर 5 वर्ष की कैद और 15,000 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है।
•
दहेज के लिए उत्पीड़न करने पर भारतीय दंड संहिता
की धारा 498-ए जो कि पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा सम्पत्ति अथवा कीमती वस्तुओं
के लिए अवैधानिक मांग के मामले से संबंधित है, के अन्तर्गत 3 साल की कैद और जुर्माना हो
सकता है।
•
धारा 406 के अन्तर्गत लड़की के पति और ससुराल
वालों के लिए 3 साल की कैद अथवा जुर्माना या दोनों, यदि वे लड़की के द्वारा लाये धन को उसे
सौंपने से मना करते हैं।
•
यदि किसी लड़की की विवाह के सात साल के भीतर
असामान्य परिस्थितियों में मौत होती है और यह साबित कर दिया जाता है कि मौत से
पहले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था, तो भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी के
अन्तर्गत लड़की के पति और रिश्तेदारों को कम से कम सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास
की सजा हो सकती है।
(5) उपसंहार
चाहे माता-पिता हों
या भाई-बहन लेकिन सभी की सोच होती है की उनकी बहन-बेटी हमेशा सुखी और सुरक्षित रहे,
लेकिन क्या किसी और
की बेटी या बहन इस सुख और सुरक्षा की अधिकारी नहीं है? ऐसे दहेज़ लोभियों को अपने ही हाथों से
अपनी कन्या का दान कर देना ऐसा है मानो हमने स्वयं ही उन्हें दुःख और दुर्दशा के
कुँए में धकेल दिया हो। हम सभी को मिलकर इस प्रथा का विरोध करना
होगा। दहेज़ न तो लेंगे और न ही देंगे।
आपसे दहेज़ की माँग
करने वाले आपके सम्बन्धी बनने के बिलकुल भी योग्य नहीं हैं। पुत्रवधु ही लक्ष्मी
का स्वरुप है, उसकी
सुरक्षा और सम्मान करना सभी का कर्तव्य है।
दहेज़ की आधुनिक परिभाषा –
“दहेज़” आपकी पुत्री के
ससुराल में सुखी और सुरक्षित रहने के प्रमाणपत्र पर लगी एक मुहर है जिसकी
अनुपस्थिति में आपकी पुत्री के सदा सुरक्षित रहने और ससुराल में निवास करने की
वर-पक्ष की कोई जवाबदारी नहीं होगी।
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